कृष्ण, अर्जुन और धर्मयुद्ध
हे कृष्ण हो रहा लाचारी, क्या हो जाऊँ अत्याचारी? कैसे हो अपनों पर ही वज्रपात, रण में होगा निर्मम रक्तपात, अपनो के विरुद्ध जो युद्ध होगा, जीना सरल नहीं होगा, क्या बन जाऊँ मैं क्रूर हिंसक? अपने ही कुल का विध्वंसक, हे केशव! हे माधव! हे सारथी! कैसे बन जाऊँ स्वार्थी? हे कृष्ण मन है विकल, दिखलाओ कोई तो हल। कृष्ण उठे सुन विकल पुकार, दूर करने पार्थ का उद्गार, बोले तुम हो कृपा पात्र, एक नूतन युग के सूत्रधार, न समझो स्वयं को विध्वंसक, जब मै ही तुम्हारा शुभचिंतक, नव सृजन के तुम हो मुख्यपात्र, नव सृजन में तुम केवल नीमित मात्र, क्या विस्मृत हुई उनकी प्रत्येक भूल? जब कुल मर्यादा रही थी झूल, क्या स्त्री-सम्मान तुम्हें लगता गौण? चीर-हरण पर महारथी क्यों थे मौन? न बन सन्यासी, निष्कर्म होकर, गांडीव उठा और कर्म कर, युद्ध ही तेरा धर्म है, युद्ध ही तेरा कर्मभी, अन्याय के अध्याय का होगा यही अंत भी, फल चाहे जो भी हो, कर्म ही लक्ष्य होगा,...